संदर्भ :भाजपा को स्थानीय शक्तिशाली नेताओं के साथ संघर्ष में उलझ जाना विपक्ष के लिए फायदेमंद होगा
जहां हम राजनीतिक बयान बाजी गिरते स्तर से चिंतित है वहीं पृष्ठभूमि में असली राजनीतिक खेल चल रहा है तेलुगू देशम और कांग्रेस के बीच गठबंधन के मुस्कुराते फोटो तो सिर्फ एक उदाहरण है कट्टर दुश्मन गले मिल रहे हैं पुराने मित्र आगे बढ़ रहे हैं भारत का राजनीतिक इतिहास कहता है कि एक शक्तिशाली खासतौर पर बहुमत प्राप्त नेता कभी उसे चुनौती देने वाले से हारा नहीं है केवल उस नेता में खुद को हराने की ताकत होती है 1977 में लोगों ने किसी को इंदिरा गांधी से ज्यादा दर्जी है देकर वोट नहीं दिए था दक्षिण को छोड़ दें तो लोगों ने उन्हें आपातकाल की ज्यादा की सजा दी थी यही राजीव गाने नए 1990 में किया वीपी सिंह ने मुख्य हिंदी सत्र में अभियान जरूर चलाया पर गए प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी या राजीव के प्रतिद्वंदी नहीं थे शाहबानो मामले से लेकर वह फोर्स व अयोध्या तक राज्य के दलित कदमों ने प्रतिबंध मतदाता को भी पार्टी से दूर कर दिया बहुमत नहीं था पर 2004 में अटल बिहारी वाजपई लोकप्रिय नेता थे उनके गुलाब को एकजुट विपक्ष नहीं था और ना ही उन्हें चुनौती देने वाला पार्टी के अहंकार के कारण बिहार गए चुनाव जल्दी कराना इंडिया शाइनिंग के अतिशयोक्ति पूर्ण दावे प्रमुख सहयोगी गवा देना और 2002 में गुजरात दंगों पर ठोस प्रतिक्रिया न दे पाने की उनकी असमर्थता के कारण अन्य का सफाया होने से हारते हो गई इस हद तक वाजपेई ने भी खुद को पराजित किया 1977 से 2004 के चुनाव बताते हैं कि कथित टीना फैक्टर दूजे वास्तविकता है पर एकमात्र नहीं भारतीय मतदाता की यह कैसी प्रवृति है कि कभी-कभी वह विक्रम अपने होते हुए भी ताकतवर नेता को सत्ता से बाहर निकाल देता है इसे सत्ता विरोधी ग्रुप नहीं कहा जा सकता क्योंकि सरकारों ने दूसरे कार्यकाल हासिल कर लिया है यहां तक कि हाल के दशकों में गठबंधन सरकारों ने भी ऐसा किया है शायद वोटर असंतुष्ट होने के बाद भी टीना फैक्टर से संचालित हुआ हो लेकिन यदि वे गुस्से में हो तो सत्ता में बैठे व्यक्ति को बाहर करना चाहता है फिर चिंता नहीं कि कौन सत्ता में आ रहा है सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार उस बिंदु पर पहुंच गई है इसका उत्तर पंडितों से जानने की बजाय जनमत संग्रह से देखे सारे गंभीर जनमत संग्रह मोदी सरकार की लोकप्रियता में गिरावट दिखा रहे हैं लेकिन वह बहुत ही में हो रही है कुल मिलाकर आंकड़े विपक्ष में से अब भी काफी आगे हैं इसलिए फिलहाल तो 1977 1990 24 जैसे पूरी तरह खारिज किए जाने की नौबत आई है इसलिए दूसरा कार्यकाल संभव है फिर चाहे बहुमत मिले राहुल गांधी से लेकर मायावती तक चाहे कोई भी हो किसी को प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर पेश करने से मोदी की हार नहीं होगी इसे राष्ट्रपति चुनाव जैसा आमने-सामने का चुनाव बना देंगे विपक्ष का कोई नेता अभी उनसे सीधे मुठभेड़ करने के लिए तैयार नहीं है बिना नेता के महागठबंधन नहीं बन सकता मोदी को हराने के दो तरीके हैं जनमत संग्रह बताते हैं कि उनकी लोकप्रियता नहीं बढ़ रही है बल्कि धीरे-धीरे घट रही है क्या विपक्षी से अगले छह माह में असंतोष में बदल सकता है यह संभव है पर ऐसा होगा नहीं रफाल अब तक बोफोर्स नहीं बना है फिर चाहे मोदी सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया में वैसी ही गलती की है जय श्री राजीव सरकार ने की थी किसानों के मुद्दे हैं पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें हैं लेकिन इसके विपरीत है वाजिब स्तर की महंगाई है खासतौर पर खाद्य पदार्थों में इसे जनता के गुस्से का चुनाव बनाने के लिए कोई जय प्रकाश नारायण या वीपीसी है नहीं है राहुल गांधी अभी या नहीं कर सकते एक तो इसलिए कि अनिल अंबानी रे कोपरेट के मित्रों के साथ भाजपा की सांठगांठ के आरोप को पर्याप्त प्रतिसाद नहीं मिल रहा है क्योंकि इन्हें कॉर्पोरेट खासतौर पर अंबानी के साथ कांग्रेस के निकटता जगजाहिर है

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