Friday, November 2, 2018

रोजगार के प्रति युवाओं में रोष

हम एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की शुरुआत देख रहे हैं क्या बेरोजगारी का मुद्दा देश की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बनेगा क्या दुनिया के इस सबसे युवा देश में युवाओं के मुद्दे और उनकी कुरजा राजनीति को संचालित करेगी एसएससी विरोधी आंदोलन के कारण यह सवाल बहुत लोगों के मन में आया है अगर इसका सीधा पकड़े रखे तो यह सवाल हमें हमारी व्यवस्था के पूरे सच को उजागर करने में मदद देता है पहली पायदान पर खड़े होकर देखे तो मामला छोटा सा है केंद्र सरकार के स्टाफ सेलेक्शन कमिशन की सीजीएल नामक परीक्षा के कुछ केंद्रों पर धंधाली होने का आरोप था इसलिए धंधाली के कुछ प्रमाण कुछ परीक्षार्थियों के हाथ लग गए

 इस मुद्दे पर परीक्षार्थियों ने सीबीआई द्वारा स्वतंत्र निष्पक्ष और समय बाद जांच की मांग को लेकर एसएससी के दफ्तर के बाहर मोर्चा संभाले हैं विरोध प्रदर्शन एक बड़ा रूप धारण कर चुका है शुरुआत में एक विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठे हुए युवा पिछले कई दिनों से वही दिन रात टिके हुए हैं सोशल मीडिया पर हजारों युवाओं ने इस आंदोलन का जमकर समर्थन किया फिर अलग अलग शहरों में इस आंदोलन के पक्ष में युवा संगठनों के प्रदर्शन शुरू कर दिया है इस घटना से एक राष्ट्रवादी युवा आंदोलन की सुगबुगाहट महसूस होने लगी है
कई लोगों को गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और बिहार आंदोलन की याद आने लगी जहां एक छोटे से मुद्दे से शुरू होकर एकाएक एक बड़ा युवा आंदोलन खड़ा हो गया था ऐसा क्यों हुआ यह सवाल हमें दूसरे पायदान पर उतरने को विवश करता है हम पाते हैं यह मामला इतना छोटा भी नहीं था केंद्र सरकार की संस्था सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए कई परीक्षा कराती है इनमें परीक्षार्थियों की संख्या एक करोड़ से भी अधिक है
जिस सीजीएल परीक्षा में धांधली के सवाल पर आंदोलन शुरू हुआ था उसमें कुल 8000 नियुक्तियां कौन थी जिसके लिए कोई 30 लाख लोगों ने आवेदन किया था यह भी एसएससी में घपले और घोटाले की यह कोई पहली शिकायत नहीं है पिछले कई वर्षों से एसएससी द्वारा आयोजित अनेक परीक्षाओं के बारे में शिकायतें आती रही है एक बड़ी शिकायत एसएससी द्वारा परीक्षा आयोजित करने का ठेका एक प्राइवेट कंपनी को दिए जाने के बारे में है यह कंपनी अनेक व्यवसायिक संस्थानों को परीक्षा केंद्र बना देती है परीक्षा कैसे ले जा रही है इस पर एसएसी का कोई नियंत्रण नहीं होता लेकिन आज तक एसएससी इन शिकायतों के निवारण की कोई व्यवस्था नहीं बना पाई है एक पायदान और उतरे तो हम पाएंगे कि यह समस्या किसी एक संस्था या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है केंद्र सरकार के साथ साथ लगभग सभी राज्य सरकारों में भी नौकरियों में नियुक्ति में बड़े पैमाने पर धांधली की शिकायतें आती रहती है सरकारी नौकरियां बहुत कम है और उम्मीदवार बेहिसाब
इसलिए जाहिर है इन चंद नौकरियों के लिए जानलेवा प्रतिस्पर्धा होती है विद्यार्थी कई कई साल तक इन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं मां-बाप के सीमित संसाधन में किसी तरह पैसा निकालकर कोचिंग लेते हैं सामान्य घर से आने वाले विद्यार्थी की पूरी जवानी इसी चक्कर में भी जाती है इसलिए जब इन परीक्षाओं में धंधा ली की भाषा में आती है तो युवाओं के गुस्से की आग स्वाभाविक है एक सीधी और गहराई में जाने पर हम देखते हैं कि यह समस्या सिर्फ सरकारी नौकरियों में धंधा ली कि नहीं है इस समस्या की जड़ में है देश में व्यापक बेरोजगारी हर साल कोई एक करोड़ युवा रोजगार के बाजार में उतरते हैं और हमारी व्यवस्था इनमें से मुट्ठी भर को ही कायदे का रोजगार दे पाती है आंकड़ों में तो देश में आर्थिक वृद्धि हुई है पर इसका रत्ती भर भी असर रोजगार के अवसरों में वर्दी के रूप में दिखाई नहीं देता रोजगार की तलाश में घूम रहे अधिकांश लोगों को किसी ना किसी कच्ची नौकरी से संतोष करना पड़ता है
या तो असंगठित क्षेत्र की नौकरी जिसमें जब मालिक का मन हुआ लगाया जब मन हुआ हटा दिया या फिर पिछले दो दशक में इसी कच्ची नौकरी के नए स्वरूप यानी कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी प्राइवेट सेक्टर ही नहीं सरकारी नौकरी में भी अब इन्हीं स्थाई कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों को भरमार है कहने को यहां नियुक्ति पत्र मिलता है बैंक में वेतन भी मिलता है पर असल में यह नौकरी असंगठित क्षेत्र की कच्ची नौकरी से बहुत अलग नहीं है
बेरोजगारों की संख्या सरकारी आंकड़े से बहुत अधिक है एसएससी दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन सिर्फ संस्था के विरुद्ध नहीं है यह उस व्यवस्था के विरुद्ध है जो नियमित रूप से बेरोजगारी को जन्म देती है सीबीआई जांच से शायद कुछ खुलासा हो यदि हॉस्टल में इस में खाने की पड़ताल शुरू हुआ नवनिर्माण आंदोलन गुजरात में सत्ता की जड़ी ला सकता है तो एसएससी घोटाले के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन हमारी राजनीति के दर्रे को बदल सकता है


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