जातिवाद
भारत में जाति सिर कालीन सामाजिक व्यवस्था है प्राचीन समय की तत्कालीन परिस्थितियों में समाज के विभिन्न वर्गों को नियमित करने के लिए वर्ण व्यवस्था का उद्भव हुआ था जो कर्म हुए व्यवसाय के सिद्धांत पर आधारित की बहू जातीय विविधता पूर्ण समाज के व्यवस्थित समंदर नियमन के लिए वर्ण व्यवस्था तत्कालीन सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों के अनुकूल मानी गई थी कालांतर में विभिन्न कारणों से यह व्यवस्था विकृत हो कर जाति व्यवस्था में बदल गई इसमें कई प्रकार के दोष उत्पन्न हो जाने से यह भेदभाव पूर्ण कार्य पर्वती पहले जाति प्रथा और आधुनिक काल में जातिवाद के रूप में विकसित हुई जिसने भारत की एकता और अखंडता को गंभीर चुनौती प्रदान की है अंग्रेजों ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए विभेद कारी सामाजिक व्यवस्था का अपने निहित स्वार्थों के लिए प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया उन्होंने इसका आपने औपनिवेशिक खेत में फायदा उठाने का प्रयत्न किया इसे और अधिक बढ़ गया अंग्रेजों द्वारा दलित वर्गों के लिए प्रथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू करने की कोशिश की गई जिसका गांधी जी ने विरोध किया इसी मुद्दे पर गांधी जी और अंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ जिसमें इन वर्गों में उचित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु स्थान आरक्षित करने की व्यवस्था स्वीकार की गई अंबेडकर ने पृथक निर्वाचन का आग्रह छोड़ दिया प्रथक निर्वाचन का उद्देश्य हिंदुओं में उच्च एवं नियमन जातियों में भूत पैदा करना था जिसको राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं महान नेता अंबेडकर दोनों ने समझा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय राजनीति का आधुनिक स्वरूप विकसित हुआ ऐसा माना जाने लगा था कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित होने के पश्चात जातिवाद श्वेता ही समाप्त हो जाएगा किंतु ऐसा नहीं हुआ इस धारणा के विपरीत स्वतंत्र भारत ने ने केवल समाज में ही वर्ण राजनीति में भी उग्र रूप से प्रवेश कर लिया स्वतंत्रता के बाद भी जातिवाद ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की केएन मेमन का निष्कर्ष सही है की स्वतंत्रता के बाद भारत के राजनीतिक क्षेत्र में जाति का प्रभाव पहले की अपेक्षा बड़ा है मोरेंस जॉन्स कहते हैं जाति के लिए राजनीतिक का महत्व एवं राजनीति के लिए जाति का महत्व पहले की तुलना में पड़ गया है स्वतंत्र भारत की राजनीति में सत्ता लोलिता ने जातिवाद भावनाओं को और ज्यादा उभारने का प्रयास किया वोट बैंक बना कर चुनाव जीत का सत्ता पर कब्जा का सत्ता सुख भोगने की राजनीतिक दलों एवं जनप्रतिनिधियों की आकांक्षा ने सदैव बढ़ा दिया है वर्तमान में जातिवाद में केवल यहां की आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक पत्तियों में प्रभावित किया है अभी तो राजनीति को भी सर्वाधिक प्रभावित किया है परंपरागत भारतीय समाज में आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना भारतीय राजनीति की एक अद्भुत विशेषता थी लोकतंत्र की स्थापना के साथ यह धारणा बनी थी कि धीरे-धीरे जातिवाद का अंत हो जाएगा अपेक्षा के विपरीत समय के साथ पश्चिमी आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना के बावजूद जातिवाद और बढ़ता रहा जहां सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में जाति की शक्ति करती है वहीं राजनीतिक एवं प्रशासन पर इसके बढ़ते हुए प्रभाव को राजनीतिज्ञों प्रशासनिक अधिकारियों एवं केंद्र राज्य सरकारों ने स्वीकार किया है राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए जातिवाद को एक हथियार के रूप में काम में लिया जाता है भारत में राजनीतिक व्यवहार पर जातिवाद का स्पष्ट प्रभाव प्रत्यक्ष में देखा जा सकता है सत्ता प्राप्ति की जबरदस्त महत्व जाति के नकारात्मक प्रभावों के बावजूद उसे ज्यादा भड़काने का प्रयास किया गया है जिससे यह सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बन गई है
इसीलिए हमारा तो यही मानना है कि जातिवाद देश के लिए एक अभिशाप है इसको खत्म करना चाहिए
अर्थ:
जब एक वर्ग पूर्णता अनुवांशिकता पर आधारित होता है तो हम उसे जाती कहते हैं जाति एक ऐसा सामाजिक समूह होता है जो दूसरों से अपने को अलग मानता है जिसकी अपनी विशेषता होती है अपनी परिधि में ही वैवाहिक संबंध करते हैं जिनका कोई परंपरागत व्यवसाय होता है जयप्रकाश नारायण के अनुसार भारत में जाति एक महत्वपूर्ण दल है जाति कही प्रकार से राजनीति मैं अपनी भूमिका अदा करती है जातीय संगठन सरकारी निर्णय को प्रभावित करते हैं प्रत्याशियों का चयन मतदान मंत्रिमंडल में भागीदारी है जातीय संगठन दबाव समूह के रूप में कार्य करते हैं जातिवाद लोगों में एकता इन सामूहिक ताकि भावना पैदा करती है लोगों में राजनीतिक जागृति एवं सक्रियता पैदा करती है खान पान वेशभूषा रहन-सहन आदि में समानता पैदा होती है
निष्कर्ष:
कहा जा सकता है कि आधुनिक भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव कैंसर एड्स जैसी भयंकर रोगों की सर्वत्र फैल गया है जिसका निदान असंभव है इसलिए भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का मूल्यांकन करना अत्यंत जटिल कार्य है यह केवल व्यक्ति व्यक्ति के बीच खाई ही पैदा नहीं करती अपितु राष्ट्रीय एकता के मार्ग में भी बाधा उत्पन्न कर रही है आज राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जातिगत हितों को विशेष महत्व दिया जा रहा है जिसके कारण हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही है प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास का मत है परंपरावादी जाति व्यवस्था ने प्रगतिशील और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था को किस तरह प्रभावित किया है कि यह राजनीतिक संस्थाएं अपने मूल रूप में कार्य करने में समर्थ नहीं रही है डीआर गाडगिल के शब्दों में क्षेत्रीय दबाव से कहीं ज्यादा खतरनाक बात यह है कि वर्तमान काल में जाति व्यक्तियों को एकता के सूत्र मैं बांधने में बाधक सिद्ध हुई है आते जातिवाद देश समाज और राजनीति के लिए बाधक है लोकतंत्र व्यक्ति को इकाई मानता है ना की किसी जातीय समूह को जाति और समूह के आतंक से मुक्त रखना ही लोकतंत्र का आग्रह
भारत में जाति सिर कालीन सामाजिक व्यवस्था है प्राचीन समय की तत्कालीन परिस्थितियों में समाज के विभिन्न वर्गों को नियमित करने के लिए वर्ण व्यवस्था का उद्भव हुआ था जो कर्म हुए व्यवसाय के सिद्धांत पर आधारित की बहू जातीय विविधता पूर्ण समाज के व्यवस्थित समंदर नियमन के लिए वर्ण व्यवस्था तत्कालीन सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों के अनुकूल मानी गई थी कालांतर में विभिन्न कारणों से यह व्यवस्था विकृत हो कर जाति व्यवस्था में बदल गई इसमें कई प्रकार के दोष उत्पन्न हो जाने से यह भेदभाव पूर्ण कार्य पर्वती पहले जाति प्रथा और आधुनिक काल में जातिवाद के रूप में विकसित हुई जिसने भारत की एकता और अखंडता को गंभीर चुनौती प्रदान की है अंग्रेजों ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए विभेद कारी सामाजिक व्यवस्था का अपने निहित स्वार्थों के लिए प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया उन्होंने इसका आपने औपनिवेशिक खेत में फायदा उठाने का प्रयत्न किया इसे और अधिक बढ़ गया अंग्रेजों द्वारा दलित वर्गों के लिए प्रथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू करने की कोशिश की गई जिसका गांधी जी ने विरोध किया इसी मुद्दे पर गांधी जी और अंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ जिसमें इन वर्गों में उचित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु स्थान आरक्षित करने की व्यवस्था स्वीकार की गई अंबेडकर ने पृथक निर्वाचन का आग्रह छोड़ दिया प्रथक निर्वाचन का उद्देश्य हिंदुओं में उच्च एवं नियमन जातियों में भूत पैदा करना था जिसको राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं महान नेता अंबेडकर दोनों ने समझा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय राजनीति का आधुनिक स्वरूप विकसित हुआ ऐसा माना जाने लगा था कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित होने के पश्चात जातिवाद श्वेता ही समाप्त हो जाएगा किंतु ऐसा नहीं हुआ इस धारणा के विपरीत स्वतंत्र भारत ने ने केवल समाज में ही वर्ण राजनीति में भी उग्र रूप से प्रवेश कर लिया स्वतंत्रता के बाद भी जातिवाद ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की केएन मेमन का निष्कर्ष सही है की स्वतंत्रता के बाद भारत के राजनीतिक क्षेत्र में जाति का प्रभाव पहले की अपेक्षा बड़ा है मोरेंस जॉन्स कहते हैं जाति के लिए राजनीतिक का महत्व एवं राजनीति के लिए जाति का महत्व पहले की तुलना में पड़ गया है स्वतंत्र भारत की राजनीति में सत्ता लोलिता ने जातिवाद भावनाओं को और ज्यादा उभारने का प्रयास किया वोट बैंक बना कर चुनाव जीत का सत्ता पर कब्जा का सत्ता सुख भोगने की राजनीतिक दलों एवं जनप्रतिनिधियों की आकांक्षा ने सदैव बढ़ा दिया है वर्तमान में जातिवाद में केवल यहां की आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक पत्तियों में प्रभावित किया है अभी तो राजनीति को भी सर्वाधिक प्रभावित किया है परंपरागत भारतीय समाज में आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना भारतीय राजनीति की एक अद्भुत विशेषता थी लोकतंत्र की स्थापना के साथ यह धारणा बनी थी कि धीरे-धीरे जातिवाद का अंत हो जाएगा अपेक्षा के विपरीत समय के साथ पश्चिमी आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना के बावजूद जातिवाद और बढ़ता रहा जहां सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में जाति की शक्ति करती है वहीं राजनीतिक एवं प्रशासन पर इसके बढ़ते हुए प्रभाव को राजनीतिज्ञों प्रशासनिक अधिकारियों एवं केंद्र राज्य सरकारों ने स्वीकार किया है राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए जातिवाद को एक हथियार के रूप में काम में लिया जाता है भारत में राजनीतिक व्यवहार पर जातिवाद का स्पष्ट प्रभाव प्रत्यक्ष में देखा जा सकता है सत्ता प्राप्ति की जबरदस्त महत्व जाति के नकारात्मक प्रभावों के बावजूद उसे ज्यादा भड़काने का प्रयास किया गया है जिससे यह सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बन गई है
इसीलिए हमारा तो यही मानना है कि जातिवाद देश के लिए एक अभिशाप है इसको खत्म करना चाहिए
अर्थ:
जब एक वर्ग पूर्णता अनुवांशिकता पर आधारित होता है तो हम उसे जाती कहते हैं जाति एक ऐसा सामाजिक समूह होता है जो दूसरों से अपने को अलग मानता है जिसकी अपनी विशेषता होती है अपनी परिधि में ही वैवाहिक संबंध करते हैं जिनका कोई परंपरागत व्यवसाय होता है जयप्रकाश नारायण के अनुसार भारत में जाति एक महत्वपूर्ण दल है जाति कही प्रकार से राजनीति मैं अपनी भूमिका अदा करती है जातीय संगठन सरकारी निर्णय को प्रभावित करते हैं प्रत्याशियों का चयन मतदान मंत्रिमंडल में भागीदारी है जातीय संगठन दबाव समूह के रूप में कार्य करते हैं जातिवाद लोगों में एकता इन सामूहिक ताकि भावना पैदा करती है लोगों में राजनीतिक जागृति एवं सक्रियता पैदा करती है खान पान वेशभूषा रहन-सहन आदि में समानता पैदा होती है
निष्कर्ष:
कहा जा सकता है कि आधुनिक भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव कैंसर एड्स जैसी भयंकर रोगों की सर्वत्र फैल गया है जिसका निदान असंभव है इसलिए भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का मूल्यांकन करना अत्यंत जटिल कार्य है यह केवल व्यक्ति व्यक्ति के बीच खाई ही पैदा नहीं करती अपितु राष्ट्रीय एकता के मार्ग में भी बाधा उत्पन्न कर रही है आज राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जातिगत हितों को विशेष महत्व दिया जा रहा है जिसके कारण हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही है प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास का मत है परंपरावादी जाति व्यवस्था ने प्रगतिशील और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था को किस तरह प्रभावित किया है कि यह राजनीतिक संस्थाएं अपने मूल रूप में कार्य करने में समर्थ नहीं रही है डीआर गाडगिल के शब्दों में क्षेत्रीय दबाव से कहीं ज्यादा खतरनाक बात यह है कि वर्तमान काल में जाति व्यक्तियों को एकता के सूत्र मैं बांधने में बाधक सिद्ध हुई है आते जातिवाद देश समाज और राजनीति के लिए बाधक है लोकतंत्र व्यक्ति को इकाई मानता है ना की किसी जातीय समूह को जाति और समूह के आतंक से मुक्त रखना ही लोकतंत्र का आग्रह

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